स्व चिंतन ..
'वाणी' मनुष्य को इस्वर की अनुपम दें है। इस वाणी के कारन ही मनुष्य अपनी अनुभूति तथा भावनाओ को अच्छी प्रकार प्रकट कर पता हैं। इस वाणी के कारण या कहे की संवाद-सम्प्रेषण के कारन ही मानव जाती में अन्य प्राणी समाज की तुलना में अधिक निकटता है,किन्तु इसका समुचित सदुपयोग करना नितांत आवश्यक है क्योकि संस्कृत यानी की संस्कार-युक्त वाणी ही मानव को सुशोभित करती है।
निश्चित ही वाणी प्रभु की मनुष्य को दी गयी अनुपम भेट है किन्तु इस अमूल्य निधि का नित्य दुरूपयोग कर मनुष्य संसार में अनेक प्रकार के कष्ट , दुःख, अपमान, निंदा, आदि सहन करता है अतः यह आवश्यक है की बोलने से पूर्व यह जान लेना की क्या बोलना है कब बोलना है कहाँ बोलना है तथा किस प्रकार बोलना है क्योकि असमय कही गयी व गलत तरीके से कही गयी बात अनिष्टकारी सिद्ध होती है। इस सम्बन्ध में रहीम जी का दोहा सदैव ध्यान में रखना चाहिए।

nice post
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